वैश्विक अर्थव्यवस्था में चल रही उथल-पुथल और पश्चिमी देशों में भर्तियों की धीमी रफ्तार के विपरीत, भारतीय जॉब मार्केट ने गजब की जीवंतता दिखाई है। ताजा आंकड़ों पर गौर करें तो भारत न सिर्फ महामारी के प्रभावों से पूरी तरह उबर चुका है, बल्कि विकास की एक नई इबारत लिख रहा है। ग्लोबल जॉब प्लेटफॉर्म ‘इंडीड’ की रिपोर्ट के मुताबिक, भारतीय रोजगार बाजार अब महामारी से पहले के स्तर से 80 प्रतिशत ऊपर पहुँच गया है, जो एक ऐतिहासिक उपलब्धि है। मई महीने में जॉब पोस्टिंग में 8.9 प्रतिशत की जो वृद्धि दर्ज की गई है, वह थोड़े समय के ठहराव के बाद बाजार की मजबूत वापसी का संकेत है।
फॉर्मल सेक्टर और सेवा क्षेत्र में बंपर मांग
अर्थव्यवस्था का औपचारिक यानी फॉर्मल सेक्टर इस समय रोजगार सृजन का मुख्य इंजन बना हुआ है। इंडीड के एपीएसी (APAC) क्षेत्र के वरिष्ठ अर्थशास्त्री कैलम पिकरिंग का मानना है कि जैसे-जैसे देश बदल रहा है, फॉर्मल सेक्टर में नौकरियां पैदा होने की दर कुल रोजगार वृद्धि से कहीं आगे निकल रही है। यही वह पहलू है जो भारत को अन्य वैश्विक अर्थव्यवस्थाओं की कतार में सबसे आगे खड़ा करता है। पिछले तीन महीनों का विश्लेषण करने पर पता चलता है कि लगभग 80 प्रतिशत व्यवसायों ने अपनी भर्तियों में इजाफा किया है।
खास बात यह है कि नौकरियों की यह बहार सिर्फ आईटी या कॉर्पोरेट जगत तक सीमित नहीं है। सामाजिक और औद्योगिक सेवाओं में भी भारी मांग देखी जा रही है। आंकड़े बताते हैं कि चाइल्डकेयर में 27 प्रतिशत, पर्सनल केयर और होम हेल्थ में 25 प्रतिशत, शिक्षा में 24 प्रतिशत और मैन्युफैक्चरिंग में 22 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई है। यह रुझान स्पष्ट करता है कि भारत अब एक अधिक स्ट्रक्चर्ड इकोनॉमी की ओर तेजी से बढ़ रहा है।
सॉफ्टवेयर और जनरेटिव एआई: बदलाव की नई आंधी
भले ही सेवा क्षेत्र में मांग बढ़ी हो, लेकिन भारत के फॉर्मल हायरिंग स्पेस पर अभी भी सॉफ्टवेयर डेवलपमेंट का दबदबा कायम है। इंडीड पर आने वाली हर पांच में से एक जॉब पोस्टिंग इसी सेक्टर से जुड़ी होती है। हालांकि, तकनीकी दुनिया में अब ‘जनरेटिव एआई’ नाम का नया क्रांतिकारी बदलाव केंद्र में आ गया है। इस साल मई तक कुल जॉब पोस्टिंग में से 1.5 प्रतिशत में जनरेटिव एआई का जिक्र था, जो पिछले साल के मुकाबले दोगुने से भी ज्यादा है।
दिलचस्प बात यह है कि एआई (AI) की यह मांग अब सिर्फ टेक कंपनियों या डेटा एनालिटिक्स तक ही सीमित नहीं रह गई है, बल्कि साइंटिफिक रिसर्च, मार्केटिंग और मैनेजमेंट जैसे क्षेत्रों में भी इसकी पैठ गहरी होती जा रही है। भौगोलिक रूप से देखें तो कर्नाटक और तेलंगाना जनरेटिव एआई के अवसरों के लिए प्रमुख हब बनकर उभरे हैं, जबकि कुल नौकरियों की संख्या के मामले में महाराष्ट्र सबसे आगे चल रहा है।
फ्यूचर ऑफ वर्क 2026: डिग्री नहीं, हुनर की होगी कद्र
वर्तमान बाजार की तेजी के साथ-साथ भविष्य की आहट भी सुनाई देने लगी है। ‘इंडिया स्किल्स रिपोर्ट 2026’ ने स्पष्ट चेतावनी और सलाह दी है कि 2025 के बाद का जॉब मार्केट पूरी तरह बदल जाएगा। भविष्य में सफलता केवल डिग्री या पुराने अनुभव से नहीं मिलेगी, बल्कि यह इस बात पर निर्भर करेगा कि आप कितनी जल्दी नई चीजें सीखते हैं। रिपोर्ट के अनुसार, 2027 तक भारत का एआई टैलेंट पूल लगभग 12.5 लाख (1.25 मिलियन) तक पहुँचने की उम्मीद है।
उद्योग जगत में अब ‘स्किल-बेस्ड हायरिंग’ यानी कौशल आधारित भर्तियों का दौर शुरू हो चुका है। रिपोर्ट बताती है कि एआई, डेटा साइंस, साइबर सिक्योरिटी और क्लाउड कंप्यूटिंग के जानकारों की मांग उपलब्ध टैलेंट से कहीं ज्यादा तेजी से बढ़ रही है। एआई से जुड़ी भूमिकाओं में दहाई अंकों की वृद्धि हो रही है, जिसका सीधा मतलब है कि लगातार अपस्किलिंग (Upskilling) अब कोई विकल्प नहीं, बल्कि अनिवार्यता बन गई है।
भर्तियों में एआई का दखल और जरूरी स्किल्स
भविष्य की कार्य-संस्कृति में बदलाव का असर केवल कर्मचारियों पर ही नहीं, बल्कि कंपनियों के काम करने के तरीके पर भी पड़ा है। भर्ती प्रक्रिया अब पहले जैसी नहीं रही। रिपोर्ट बताती है कि लगभग 70 प्रतिशत आईटी कंपनियां और बैंकिंग व वित्तीय सेवाओं (BFSI) की 50 प्रतिशत फर्में अब उम्मीदवारों को चुनने के लिए एआई का इस्तेमाल कर रही हैं। यह पिछले साल के पायलट प्रोजेक्ट्स के मुकाबले एक बहुत बड़ी छलांग है।
इस बदलते दौर में प्रासंगिक बने रहने के लिए, चाहे वह कोयंबटूर का कोडर हो या पुणे का उद्यमी, सबको तकनीकी रूप से दक्ष होना होगा। 2025 के बाद अगर आपको रेस में बने रहना है, तो आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और डेटा साइंस की बुनियादी समझ होना अनिवार्य है। आपको मशीन लर्निंग के बेसिक्स, ऑटोमेशन की समझ और डेटा के आधार पर निर्णय लेने की क्षमता विकसित करनी होगी।
सिर्फ कोडिंग आना अब काफी नहीं है। आपको क्लाउड कंप्यूटिंग (जैसे AWS, Azure) और साइबर सिक्योरिटी की जानकारी भी होनी चाहिए। इसके साथ ही, ‘हाइब्रिड वर्क मॉडल’ और आंतरिक गतिशीलता (Internal Mobility) के बढ़ने से ‘सॉफ्ट स्किल्स’ जैसे कि स्टोरीटेलिंग और समस्या सुलझाने (Problem-solving) की मानसिक क्षमता भी उतनी ही महत्वपूर्ण हो गई है। कुल मिलाकर, भारत का वर्कफोर्स अब एक ऐसे दौर में प्रवेश कर रहा है जहाँ रैखिक करियर पथ (Linear career paths) की जगह हाइब्रिड भूमिकाएं और लगातार सीखना ही सफलता का मूलमंत्र होगा।